अखिल भारतीय अधिवक्ता संघ ने न्यायालय परिसर गुड़गाँव में देश के महान समाज सुधारकों; महात्मा जोतिबा फुले तथा बाबा साहब डाक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर समानता दिवस का आयोजन किया जिसकी अध्यक्षता अधिवक्ता संघ के ज़िला अध्यक्ष एडवोकेट राजेन्द्र पाठक ने तथा संचालन ज़िला सचिव एडवोकेट विनोद भारद्वाज ने किया। आगंतुकों ने परिसर में रखे गए महात्मा फुले व बाबा साहब के चित्रों पर माल्यार्पण कर पुष्पांजलि भेंट की।

मुख्य वक्ता के रूप में, शहीद यादगार समिति के ज़िला संयोजक मेजर एस एल प्रजापति ने दोनों विभूतियों के संघर्षमय जीवन पर प्रकाश डालते हुये बताया कि अठारवीं सदी में अंग्रेजों के आगमन के पश्चात देश में सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक उथल पुथल हो रही थी उस वक्त महात्मा फुले ने समाज में व्याप्त धार्मिक व सामाजिक कुरीतियों कि जड़ पर सुधारों का आघात किया। मजदूर व किसान जातियों,महिलाओं व समाज के अन्य निचने तबकों को जब शिक्षा का अधिकार नहीं था उस समय महात्मा फुले ने इन जातियों के बच्चो के लिए शिक्षा के प्रसार का काम अपने कंधों पर लिया। उच्च वर्ण की बालिकाओं को भी उन दिनों शिक्षा का अधिकार नहीं था। महात्मा फुले व उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले ने समाज का उत्पीड़न झेलते हुये देश में लड़कियों के लिए पहली पाठशाला की नीव रखी। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को आज समाज व सरकार दोनों ने ही भुला दिया है। विधवा विवाह के समर्थन व बाल विवाह के वीरुद्ध काम करने के साथ साथ एकल स्त्रियॉं से जन्में बच्चों के लिए अनाथ आश्रमों की स्थापना की तथा परितक्यता स्त्रियॉं को अपने यहाँ सहारा दिया। उच्च जाति के लोग उन दिनों शूद्रों को पानी तक नहीं देते थे तब उन्होने अपने घर में बने कुएं से लोगों को पानी लेने का अधिकार देकर रूदीवादी समाज की मान्यताओं पर कठोर प्रहार किए। सामाजिक न्याय के इस पुरोधा ने जीवन पर्यंत अपने ही देश में मानवीय अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ी मगर धार्मिक अंधविश्वासों, सामाजिक कुरीतियों व आर्थिक विषमताओं को बड़ी हद्द तक तोड़ पाने में सफल हुये। उन्होने कहा कि देश में आज फिर पुरातनपंथी ताकते अपना वर्चश्व कायम करने में जुटी हैं। ऐसे हालत में हमें महात्मा फुले द्वारा किए गए सामाजिक सुधारों को एक बार फिर समाज में लेजाने कि आवश्यकता है।

बाबा साहब डाक्टर भीमराव अंबेडकर; जिनका जन्म 14 अप्रैल 1891 के दिन अर्थात महात्मा फुले की मृत्यु के एक साल बाद हुया; उनके अधूरे कामों को आगे बढ़ाने में अपने जीवन की आहूति दे दी। डाक्टर अंबेडकर ने महात्मा फुले को अपना गुरु माना व उनके द्वारा शुरू किए गए सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाया। समाज की विकृत मान्यताओं व धार्मिक ढकोसलों के वीरुद्ध डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने जिस लड़ाई को जीता उसका उदाहरण हमारे संविधान में उल्लेखित सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय की परिकल्पना है, जो हर भारतीय को बिना किसी संप्रदाय, जाति, रंग, भाषा, क्षेत्र में बिना भेदभाव के उपलब्ध है। पिछड़े, दलितों व आदिवासियों के मानवीय अधिकार दिलवाने में डाक्टर अंबेडकर ने पूरा जीवन लगा दिया, जिसकी बदोलत आज हर व्यक्ति सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार रखता है।

इस अवसर पर सीनियर एडवोकेट, आर के यादव, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की राज्य उपाध्यक्ष व ज़िला सचिव उषा सरोहा, सैनी सभा के अध्यक्ष राधे श्याम सैनी, एडवोकेट डाक्टर महेंद्र सिंह रेनीवाल, एडवोकेट नीलम दहिया, सुरेश बोहत, एडवोकेट ममता कालरा, राहुल भारद्वाज, युधिसठर सेठ के साथ साथ हरियाणा सरकार में नेता प्रतिपक्ष, अभय चौटाला व भूतपूर्व उपाध्यक्ष विधान सभा श्री गोपी चंद गेहलोत ने भी दोनों विभूतियों को याद करते हुये श्रद्धासुमन अर्पित किए।

delhincrnews.in reporter

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