सरकार ने हर जनपद में एक ऐसा भोजनालय बनाये जाने का प्रस्ताव रखा जहां भूखा व्यक्ति बिना किसी हिचक और संकोच के कम से कम एक समय भर पेट भोजन कर सकें। सहारनपुर जनपद में इसकी पहल करते हुए आयुक्त दीपक अग्रवाल व जिलाधिकारी प्रमोद कुमार पाण्डेय के प्रयासों व स्थानीय नागरिकों एवं संगठनों के सहयोग से जनमंच के पास ‘प्रभु की रसोई’ की शुरूआत की गयी। 9 अगस्त, 2017 को प्रदेश के कृषि, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान, कृषि व्यापार मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने इस पुनीत कार्य की शुरूआत की। शुरूआती दौर में कई प्रकार की कठिनाईयों का सामना करते हुए आज ‘‘प्रभु की रसोई’’ गरीब व भूखों के पेट भरने का एक महत्वपूर्ण स्थल बन गया। कई सामाजिक संगठनों, व्यापारिक संगठनों एवं स्वयं सेवी संस्थाओं तथा गणमान्य नागरिकों ने मदद के लिए हाथ बढ़ायें और नियमित रूप से भूखों को भोजन मिलने लगा। प्रशासन व स्थानीय नागरिकों के सहयोग से चलने वाली प्रभु जी की रसोई का उत्तरदायित्व देख-रेख करने की जिम्मेदारी समाज सेवी शीतला टंडन को सौंपा गयी।
प्रभु जी की रसोई’ आज भूखों की आशा का केन्द्र बन चुका है। प्रतिदिन लगभग 450 से 500 लोग यहां बिना किसी संकोच के भर पेट भोजन करते हैं। टंडन के अनुसार ‘प्रभु जी की रसोई’ की स्वच्छता का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। साथ ही खाने की गुणवत्ता एवं शुद्धत्ता तथा सब्जियांे में लगने वाले मसालों की गुणवत्ता का भी ध्यान रखा जाता है। रसोई के संचालन में पूरी पारदर्शी व्यवस्था के साथ सप्रेम आनंदमय वातावरण में भोजन ग्रहण कराया जाता है। रसोई से जुड़े लोगों का मानना है कि ‘भूख के खिलाफ भूख को मिटायेंगे’’ के नारे को मूर्त रूप देने के लिए प्रभुजी की रसोई को बंद नहीं होने दिया जायेंगा। रसोई के माध्यम से आम जनता में स्वच्छता के प्रति भी जागरूक किया जाता है।
भोजन के लिए आने वाले लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के साथ ही इससे होने वाले फायदें के बारे में भी जानकारी दी जाती है। प्रभुजी की रसोई के संचालन के लिए दानी लोग अपनी श्रद्धा से दान करते है। जिससे संचालन में कोई कठिनाई नहीं आती। प्रभुजी की रसोई की शुरूआत से लेकर अब तक लगभग 20-21 हजार लोगों ने भोजन किया गया है।
भूखों को मुफ्त भोजन के लिए अपना सहयोग देने के लिए रोज कई लोग आते है। सेवाभाव से भूखों को भोजन कराने के साथ ही दान देकर चले जाते है। ऐसे ही धनबाद, राज्य झारखण्ड़ से अपने पुत्र मण्डल आयुक्त दीपक अग्रवाल से मिलने आय बी.एम. अग्रवाल व सुशीला अग्रवाल भी ‘ प्रभुजी की रसोई’ को देखने पहुंच गये।
प्रभुजी की रसोई की व्यवस्था को देख कर खुशी का इजहार करते हुए संचालकों से कहा कि यह पुनीत कार्य बंद नहीं होना चाहिए। भूखों को भोजन कराना नर नारायण की सेवा है। इससे अभिभूत होकर बी.एल. अग्रवाल ने अपने हाथों से लोगों को भोजन कराया।
उन्होंने कहा कि इस पुनीत कार्य में भागीदार होकर मैं अपने को धन्य पा रहा हॅू। उन्होंने इसके लिए संचालकों का आभार व्यक्त करते हुए पिता ने अपने मण्डल आयुक्त पुत्र से कहा कि ‘प्रभुजी की रसोई’ कभी बंद नहीं होनी चाहिए। पिता के आदेश को पाकर मण्डल आयुक्त पुत्र अभिभूत हो गये और कहां कि उनके रहते इस कार्य को बंद नहीं होने दंेगे।
‘प्रभुजी की रसोई’ में प्रतिदिन 9 से 11 हजार रूपये का खर्च आता है। खाने में प्रतिदिन दाल, सब्जी, चावल व रोटी दी जाती है। सप्ताह में एक या दो दिन हलवा भी दिये जाने की व्यवस्था की जाती है। भोजन करने वालों का कोई मापदण्ड़ नही है। साधुसंत, आम नागरिक, यात्री तथा भिकारी भी शामिल होते है। सभी को एक साथ बिना किसी भेदभाव के प्रेमभाव से भोजन कराया जाता है।
टंडन ने अनुसार प्रभुजी की रसोई में आने वालों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। कई ऐसे लोग भी है जो अपने घर में खाने का इंतजाम नहीं कर पाते वो नियमित रूप से खाना खाने आते है। रसोई का संचालन के लिए 6 से 7 कर्मचारी काम करते है।
रसोई का संचालन प्रातः 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक किया जाता है। सभी कर्मचारी और आने वाले अधिकारी व दानकर्ता प्रभुजी की रसोई का बना ही खाना खाते है। इस कार्य के संचालन से जहां आत्म संतोष मिलता है। वहीं देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने पर भी बल मिलता है। जो लोग भूखे है उनके प्रति भी किसी ना किसी को तो दायित्व लेना ही पड़ेगा। छोटे स्तर पर ही सही हम अपने प्रशासनिक अधिकारियों के सहयोग से ‘प्रभुजी की रसोई’ का संचालन कर देश के विकास में मामूली सा सहयोग कर रहे है।

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