गुड़गाँव, 5 अप्रैल 2017: ट्रेड यूनियनों व कर्मचारी संगठनों की संयुक्त समिति, जिला गुड़गाँव व रेवाड़ी कि ओर से जारी- कर्ता, राजेन्द्र सरोहा, सचिव, सीआईटीयू गुड़गाँव: 

गुरुग्राम कोर्ट द्वारा मारुति के 13 श्रमिकों को आजीवन कारावास, चार को पाँच पाँच वर्ष का कारावास तथा 14 श्रमिकों को जीतने दिन जेल में रहे उसी को सज़ा मान कर व 117 श्रमिकों को बिना वजह साढ़े चार साल तक जेल में रखने के अन्यायपूर्ण फैसले के खिलाफ देश कि 12 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर ट्रेड यूनियन काउंसिल गुड़गाँव-रेवाड़ी ने आज कमला नेहरू पार्क में रेली का आयोजन किया गया। इसकी अध्यक्षता आईएनटीयूसी के सतपाल गिल, एआईटीयूसी के कुलदीप सिंह, सीआईटीयू के कामरेड राज सिंह, एचएमएस के जसपाल राणा, रीको धरूहेड़ा के राज कुमार, होंडा के प्रधान रमेश मोहता, हीरोमोटों के सुंदर लाल व मारुति मजदूर संघ के प्रधान अजमेर यादव ने की।

विभिन्न ट्रेड यूनियनों व जन संगठनों के राष्ट्रीय नेता जिनमें सीआईटीयू के राष्ट्रीय महासचिव व राज्य सभा सांसद कामरेड तपन सेन, राज्य प्रधान कामरेड सतवीर सिंह, ज़िला सचिव कामरेड राजेन्द्र सरोहा, एचएमएस के राष्ट्रीय हमासचिव श्री हरभजन सिंह सिद्धू, कामरेड सुरेन्द्र लाल, आईएनटीयूसी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व पूर्व सांसद श्री राम चंदर कोंडीया, एआईटीयूसी के राष्ट्रीय सचिव कामरेड डी एल सचदेवा व कामरेड गिरि, राज्य प्रधान श्री अमित यादव, श्री अनूप सिंह व श्री धर्मवीर लोहान कामरेड बलदेव घनघस, एआईयूटीयूसी के राष्ट्रीय सचिव कामरेड सत्यवान, मजदूर एकता मंच के प्रकाश रावत, सर्वकर्मचारी संघ के ज़िला प्रधान श्री कंवर लाल यादव व सचिव श्री संजय सैनी, जनवादी महिला समिति की राज्य उप प्रधान कामरेड उषा सरोहा ने सभा को संबोधित किया।

अपर जनसमूह को संबोधित करते हुये वक्ताओं के कोर्ट के फैसले से अपनी असहमति जाहीर करते हुये इसे उच्च न्यायालय में ले जाने की बात रखते हुये कहा की इस फैसले से साफ जाहीर हो गया है की केंद्र व राज्य की सरकार का चरित्र मजदूर विरोधी है। 18 जुलाई 2012 को मारुति मनेसार में घटित दुर्घटना को दुर्भाग्य पूर्ण मानते हुये ट्रेड यूनियनों ने इसकी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की थी। मैडिकल रिपोर्ट के आधार पर प्रबंधक की मौत धुएं में दम घुटने से हुई। यही नहीं आरोपी पक्ष ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका जिससे मजदूरों पर हत्या का दोष साबित हो सके। इसके बावजूद सजा दे दी गई। सरकार, मैनेजमेंट व प्रशासन का रवैया पहले ही दिन से मजदूरों के खिलाफ था तांकी मजदूरों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा सके। इस पूरे मामले में तत्कालीन राज्य सरकार का रूख मालिकपरस्ती व मजदूरों का भारी उत्पीड़न करवाने व उन्हें हत्यारा साबित करने का रहा है। इस घटना के बहाने मारूति के मालिक ने 546 स्थाई वर्करों समेत 2500 के करीब मजदूरों को उस समय नौकरी से निकाल दिया जिनका कोई कसूर ही नहीं था। इससे यह साबित होता है कि मजदूरों व उनके परिवारों का भयंकर उत्पीड़न किया गया है। वक्ताओं ने इसके विरोध में व मजदूरों व उनके परिवारों के प्रति एकजुटता प्रकट करते हुए तथा श्रम अधिकारों की हिमायत में जोरदार प्रदर्शन करते निम्नलिखित मांग की कि सजायाफ्ता मारूति मजदूरों को तुरंत रिहा करवाया जाए कोर्ट द्वारा बाईज्जत बरी किए गए 117 मजदूरों सहित 18 अप्रैल 2012 से मारूति कंपनी से निकाले गए 2500 के करीब स्थाई व अस्थाई वर्कर्स को दोबारा काम पर रखवाया जाए तथा उन्हें इस बीच गुजरे समय का पूरा मुआवजा दिलवाया जाए। इतने बड़े पैमाने पर वर्कर्स का रोजगार छीनने, मजदूरों का भंयकर उत्पीड़न करने में शामिल मारूति कंपनी प्रबंधन, प्रशासनिक मशीनरी के खिलाफ कार्यवाही की जाए। ठेका प्रथा को पूरे तौर पर खत्म किया जाए व अस्थाई/ठेका कर्मियों को पक्का किया जाए। समान काम-समान वेतन के बारे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की अविलम्ब अनुपालना हो। ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमले बंद हों व श्रम कानूनों में संशोधन वापिस हों। श्रम कानूनों की उल्लंघना करने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाए।

 

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